
श्री राजस्थान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में भिवंडी के भगवान महावीर रोड स्थित महावीर भवन के गुरु श्रेष्ठ पुष्कर देवेंद्र दरबार में चातुर्मासार्थ विराजित राष्ट्रसंत,उपप्रवर्तक, दक्षिणसम्राट,घोर तपस्वी, आराध्य पूज्य गुरुदेव श्री नरेश मुनि म.सा. ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि एक पुरानी कहावत है कि 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत'। वह व्यक्ति हार ही गया जिसके मन में यह संदेह है कि वह हार जाएगा। व्यक्ति का यह कुंठित विचार ही उसकी पराजय का पहला कारण बनता है। वहीं यदि कोई व्यक्ति यह विचार करता है कि वह हर हालत में जीतेगा ही तो उसको दुनिया की कोई ताकत नहीं हरा सकती। जब कोई मैदान में उतरता है तो वहां एक नही असंख्य प्रतिस्पर्धी होते हैं। पर जीतता एक ही है, क्या आपने उस विजेता के सीने को देखा है, उसके पुश्टों को देखा है, मैं कहूंगा कि जीतने वाला शरीर की दृष्टि से उतना ही बलवान होता है जितना की हारने वाला। शरीर से कोई व्यक्ति निर्बल है तो चल जाएगा, पर मन से कमजोर रहने वाला व्यक्ति कभी भी अपनी जिंदगी में कामयाबियों को हासिल नही कर सकता है। मजबूत शरीर और मजबूत मन ही श्रेष्ठ हैं, कमजोर शरीर और मजबूत मन फिर भी स्वीकार्य है पर मजबूत शरीर और कमजोर मन का साथ कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है। आज व्यक्ति के भीतर दुर्बलता घर कर चुकी है जिसने मन को जर्जर कर दिया है। जिसके फलस्वरूप निराशा,हताशा,अवसाद,निरुत्साह के राक्षसों से व्यक्ति घिर चुका है, अगर कोई व्यक्ति शरीर से बूढ़ा हो पर उसके भीतर उत्साह,ऊर्जा,उमंग और आशा है तो वह अभी भी युवा है।
इसी प्रकार मधुरवक्ता शासनरत्न मुनि श्री शालिभद्रजी म.सा. ने कहा कि हमने शरीर को अपना माना है। जबकि ज्ञानियों ने कहा कि क्या शरीर और आत्मा में कोई समानता है ? आत्मा शाश्वत,नित्य,अविनाशी है। इसी प्रकार शरीर अशाश्वत,अनित्य एवं विनाशी है, कुछ भी समानता नही है फिर भी शरीर व आत्मा की कैसी मित्रता ? कितनी गहरी दोस्ती ? तीर्थकर परमात्मा यह तो बता सकते हैं कि जीव कब मुक्त होगा। लेकिन यह नही बता सकते कि इस जीव व कर्म की दोस्ती कब से है। सर्व क्षणिक है स्थायी कुछ भी नही। पल-पल हमारी आयु क्षीण होती जा रही है। यानी कि पताशे के समान इस तन का तमाशा है। इस धर्मसभा का संचालन संघमंत्री अशोक बाफना ने किया और जानकारी लक्ष्मीलाल दोशी ने दिया।

