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दंड देने के अधिकारी हम नही

भिवंडी ।एम हुसेन।भिवंडी के कामतघर- ताड़ाली स्थित स्वामी गंभीरानंद नवनिर्माण ट्रस्ट के स्वामी श्री गंभीरानंद सरस्वती जी महाराज ने गुरुकुल सन्देश देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को दंड देने का अधिकारी वही व्यक्ति हो सकता है|। जिसने अपने जीवन में कभी कोई अपराध नही किया है लेकिन हम लोग अज्ञानता के कारण प्रायः ऐसा ही व्यवहार करते है। दूसरों की गल्ती दिखी नही कि उसे सजा देने के लिए हम तैयार हो जाते है। उस समय हम यह भूल जाते हैं कि हम भी उसी तरह कितनी गलतियां स्वयं करते रहते हैं या फिर पहले किए हुए रहते है। हमारी उंगलियां हमेशा दूसरों की गलतियों के तरफ ही इशारा करती रहती हैं। साधारण मनुष्य के लिए यह एक साधारण सी बात है क्योंकि सृष्टिकर्ता ने हमारी इंद्रियों को बहिर्मुख ही बनाया है, परंतु जो आत्म कल्याणकामी होते हैं,साधक होते हैं उन्हें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि दूसरों की गल्तियां देखने से पहले स्वंय की गल्तियां ढूंढ लेने में ही अपना कल्याण है। दूसरों का दोष देखने का सामर्थ्य तो किसी में भी हो सकता है लेकिन स्वंय का दोष - दुर्बलता को देखपाना सबके वश की बात नही है ।

    उन्होंने दंड देने के संबंध में ईसा मसीह का एक उदाहरण देते हुए कहा कि एक दिन ईसा मसीह कहीं जा रहे थे उन्होंने देखा कि कुछ लोग एक युवती को घेरे खड़े हैं और क्रोध से लाल-पीले होकर उसे गालियां दे रहे है, ईसा मसीह ने जब उनसे पूछा कि आप लोग इस अकेली युवती पर इतना अधिक क्रोध क्यों कर रहे हो ? तो कई लोग एक साथ बोल उठे कि यह युवती चरित्र हीन है । आज हम लोग इसे पत्थरों से मार डालेंगे  उसी बीच कुछ लोगों ने पत्थर उठा भी लिया था लेकिन यीशु ने गंभीर होकर कहा कि यह बात तो बिल्कुल ठीक है कि व्यभिचार पाप है, आप लोगों का क्रोधित होना भी उचित है लेकिन दंड देने का अधिकारी वही आदमी हो सकता है जिसने अपने जीवन में कभी कोई अपराध नही किया है। इस युवती को पहला पत्थर वही मारे जिसने मन,वचन तथा शरीर से कभी पाप कर्म न किया हो। आप लोगों में से कोई भी व्यक्ति इस प्रकार का है तो वह आगे आएं , यीशु के वचन सुनते ही एक-एक करके सब लोग वहां से चले गए ।     

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